मंगलवार, 12 जनवरी 2016

भारत और PAK का था एक आर्मी चीफ, सरदार पटेल ने लगाई थी फटकार

फाइल फोटो- कश्मीर इनसेट में सरदार पटेल।

अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने पठान कबिलाइयों, पूर्व सैनिकों तथा ‘अवकाश पर गए‘ सैनिकों की टुकड़ी से जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया।
ब्रिटिश थे भारत की थल सेना के अध्यक्ष...
यह एक अनोखा युद्ध था। यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें दोनों देशों की सेनाओं का नेतृत्व तीसरे देश के सेनाध्यक्ष के हाथ में था। ब्रिटिश जनरल नए-नए बने देश भारत और पाकिस्तान की सेनाओं का नेतृत्व कर रहे थे। यहां तक कि भारत में कैबिनेट की डिफेंस कमेटी की अध्यक्षता लार्ड माउंटबेटन द्वारा की जा रही थी न कि प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा। भारत पाकिस्तान से कैसे निपटे इसका फैसला उन ब्रिटिश अधिकारियों को लेना था जो दोनों सेनाओं के उच्च पदों पर थे।
भारतीय सेना के ब्रिटिश अधिकारी
अगस्त 1947 के बाद तीन ब्रिटिश अधिकारी भारतीय सेना में सेवारत थे। सेनाध्यक्ष के रूप में लॉकहार्ट 15 अगस्त 1947 से 31 दिसंबर 1947 तक रहे इसके बाद बाऊचर एक जनवरी 1948 से 14 जनवरी 1949 और आर्मी कमांडर के रूप में रुसेल अगस्त 1947 से जनवरी 19 जनवरी 1948 तक जब करिअप्पा ने उनसे कार्यभार संभाला।
लॉकहार्ट नहीं था वफादार
उपरोक्त तीनों ब्रिटिश अधिकारियों में से लॉकहार्ट भारत के प्रति वफादार नहीं थे। महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 की दोपहर बाद भारत में विलय किया। तबके ब्रिटिश अधिकारियों ने कश्मीर जाने से मना कर दिया।
जब सरदार पटेल ने लगाई फटकार
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और सेनाध्यक्षों ने अपने-अपने तर्क दिए। उनका कहना था कि हम कश्मीर में सेना नहीं भेज सकते। सरदार पटेल ने सबकी बात सुनी, अचानक बहुत तेज आवाज में उन्होंने सेनाध्यक्षों को फटकार लगाते हुए कहा कहा- आप लोग तैयारी कीजिए कल आपको एयरफोर्स के जहाज कश्मीर जाने के लिए तैयार मिलेंगे इससे हमारे सैनिक जाएंगे। किसी भी हालत में कश्मीर हाथ से नहीं जाना चाहिए।


सोमवार, 28 दिसंबर 2015

अब सड़कों पर पागलों जैसे घूमता है ये महान वैज्ञानिक

रविवार, 27 दिसंबर 2015

'पादना' बुरी बात नहीं है भाई !!



आज मैं ऐसे विषय पर बात कर रह हूँ , जो इंसान के इस पृथ्वी पर आगमन के समय से ही सदा बेहद उपयोगी परन्तु बेहद उपेक्षित विषय रहा है, और जिसका नाम लेना भी उसी तरह असभ्यता समझी जाती है । 
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इसको बच्चा बच्चा जानता है ....?
क्योंकि पाद ऐसा होता है जो शुरु से ही बच्चों का मनोरंजन करता है ।
और इसीलिये बच्चे कहीं भी पाद देते हैं..??
तब उन्हें बङे सिखाते हैं कि बेटा यूँ अचानक कहीं भी पाद देना उचित नहीं हैं..??
अब इन बङों को कौन सिखाये कि पादा भी क्या अपनी इच्छा से जाता है..?? 
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अरे वो तो खुद ही कभी भी कहीं भी आता है ।
अगर प्रधानमंत्री को भरी सभा में पाद आये तो पादेंगे नहीं क्या..?
इसलिये पाद पर किसी तरह का नियंत्रण संभव ही नहीं है । 
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आपका यदि डाक्टरी चेकअप हो ।
तो ध्यान दें ......
डाक्टर ने आपसे यह सवाल भी अवश्य किया होगा कि पाद ठीक से आता है... ?
क्योंकि डाक्टर जानता है कि पाद चेक करने की अभी तक कोई अल्ट्रासाउंड या एम.आर. आई. जैसी मशीन नहीं बनी...? 
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ये तमाम चूरन - चटनी हाजमोला जैसी गोलियों का करोङों रुपये का कारोबार केवल इसी बिन्दु पर तो निर्भर है कि जनता ठीक से पादती रहे ....? 
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यदि आपको दिन में 4 बार और रात को लगभग 10 बार अलग अलग तरह के पाद नहीं आते । तो आपके ये पाउडर लिपिस्टिक सब बेकार है । 
क्योंकि अन्दर से आपका सिस्टम बिगङ रहा है ।
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यदि लिवर ही ठीक से काम नहीं कर रहा तो अन्य अंगो को पोषण कहाँ से मिलेगा ।
इसलिये पादने में संकोच न करें और खूब पादें ।
क्योंकि पादना बुरी बात नहीं है भाई..? 
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🚶पादों के प्रकार .......
पादों के पांच प्रकार होते हैं:-
1- पादों का राजा है "भो पाद" ।
हमारे पूर्वज इसे उत्तम पादम् कहते थे । यह घोषणात्मक और मर्दानगी भरा होता है । इसमें आवाज में धमक ज्यादा और बदबू कम होती है । अतएव
जितनी जोर आवाज, उतना कम बदबू ...
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2- 'शहनाई' -
हमारे पूर्वजो ने इसे मध्यमा ही कहा है ।
इसमें से आवाज निकलती है ठें ठें या कहें पूंऊऊऊऊऊ .......
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3- 'खुरचनी'-
जिसकी आवाज पुराने कागज के सरसराहट जैसी होती है। यह एक बार में नई निकलती है। यह एक के बाद एक कई 'पिर्र..पिर्र..पिर्र..पिर्र' की आवाज के साथ आता है ।
यह ज्यादा गरिष्ठ खाने से होता है ।
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4- 'तबला' -
तबला अपनी उद्घोषणा केवल एक फट के आवाज के साथ करता है ।तबला एक खुदमुख्तार पाद है क्योंकि यह अपने मालिक के इजाजत के बगैर ही निकल जाता है । अगर बेचारा लोगों के बीच बैठा हो तो शर्म से पानी-पानी हो जाता है ।
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5- 'फुस्कीं' -
यह एक निःशब्द 'बदबू बम ' है ।
चूँकि इसमें आवाज नई होती है इसलिए ये पास बैठे व्यक्ति को बदबू का गुप्त दान देने के लिए बढ़िया है और दान देने वाला अपने नाक को बंद कर के मैने नई पादा है का दिखावा बङी आसानी से कर सकता है । लेकिन गुप्त दान देने के बाद जापानी कहावत " जो बोला , सो पादा " ......याद रखते हुए लोगों को खुद ही दाता को ताङने दीजिए ।
आप मत बोलिए । 
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अब अपने पाद की श्रेणी निर्धारित करते हुए पाद का आनन्द उठाइये जम कर बेझिझक और खुलकर पादीये ....... 
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नोट ;— इस मेसेज को केवल व्यंग्य के तौर पर न लें जी । आपके शरीर में होने वाली कई क्रियाओं का सम्बंध है पादने से ।

teacher par sansani khej nibandh.......


शनिवार, 26 दिसंबर 2015

ऐसे तोड़ा गया पूरा हिंदुस्तानः 1857 से 1947 के बीच बने 7 नए देश

अखंड भारत का नक्शा।

 1857 से 1947 तक हिंदुस्तान के कई टुकड़े कर अंग्रेजों ने सात नए देश बना दिए थे। 1947 में बना पाकिस्तान भारतवर्ष का पिछले 2500 सालों में 24वां विभाजन था।
आज तक किसी भी इतिहास की पुस्तक में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता की बीते 2500 सालों में हिंदुस्तान पर जो आक्रमण हुए उनमें किसी भी आक्रमणकारी ने अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, भूटान, पाकिस्तान, मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया हो। अब यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह देश कैसे गुलाम और आजाद हुए। पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। बाकी देशों के इतिहास की चर्चा नहीं होती। हकीकत में अंखड भारत की सीमाएं विश्व के बहुत बड़े भू-भाग तक फैली हुई थीं।
(स्रोत- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार के अखंड भारत के खंडन का इतिहास लेख पर आधारित। फोटो इंटरनेट)
एवरेस्ट का नाम था सागरमाथा, गौरीशंकर चोटी
पृथ्वी का जब जल और थल इन दो तत्वों में वर्गीकरण करते हैं, तब सात द्वीप एवं सात महासमुद्र माने जाते हैं। हम इसमें से प्राचीन नाम जम्बूद्वीप जिसे आज एशिया द्वीप कहते हैं तथा इन्दू सरोवरम् जिसे आज हिन्दू महासागर कहते हैं, के निवासी हैं। इस जम्बूद्वीप (एशिया) के लगभग मध्य में हिमालय पर्वत स्थित है। हिमालय पर्वत में विश्व की सर्वाधिक ऊंची चोटी सागरमाथा, गौरीशंकर हैं, जिसे 1835 में अंग्रेज शासकों ने एवरेस्ट नाम देकर इसकी प्राचीनता व पहचान को बदल दिया।
ये थीं अखंड भारत की सीमाएं
इतिहास की किताबों में हिंदुस्तान की सीमाओं का उत्तर में हिमालय व दक्षिण में हिंद महासागर का वर्णन है, परंतु पूर्व व पश्चिम का वर्णन नहीं है। परंतु जब श्लोकों की गहराई में जाएं और भूगोल की पुस्तकों और एटलस का अध्ययन करें तभी ध्यान में आ जाता है कि श्लोक में पूर्व व पश्चिम दिशा का वर्णन है। कैलाश मानसरोवर‘ से पूर्व की ओर जाएं तो वर्तमान का इंडोनेशिया और पश्चिम की ओर जाएं तो वर्तमान में ईरान देश या आर्यान प्रदेश हिमालय के अंतिम छोर पर हैं।
एटलस के अनुसार जब हम श्रीलंका या कन्याकुमारी से पूर्व व पश्चिम की ओर देखेंगे तो हिंद महासागर इंडोनेशिया व आर्यान (ईरान) तक ही है। इन मिलन बिंदुओं के बाद ही दोनों ओर महासागर का नाम बदलता है। इस प्रकार से हिमालय, हिंद महासागर, आर्यान (ईरान) व इंडोनेशिया के बीच का पूरे भू-भाग को आर्यावर्त अथवा भारतवर्ष या हिंदुस्तान कहा जाता है
अब तक 24 विभाजन
सन 1947 में भारतवर्ष का पिछले 2500 सालों में 24वां विभाजन है। अंग्रेज का 350 वर्ष पूर्व के लगभग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में व्यापारी बनकर भारत आना, फिर धीरे-धीरे शासक बनना और उसके बाद 1857 से 1947 तक उनके द्वारा किया गया भारत का 7वां विभाजन है। 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग किमी था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग किमी है। पड़ोसी 9 देशों का क्षेत्रफल 50 लाख वर्ग किमी बनता है।
क्या थी अखंड भारत की स्थिति
सन 1800 से पहले विश्व के देशों की सूची में वर्तमान भारत के चारों ओर जो आज देश माने जाते हैं उस समय ये देश थे ही नहीं। यहां राजाओं का शासन था। इन सभी राज्यों की भाषा अधिकांश शब्द संस्कृत के ही हैं। मान्यताएं व परंपराएं बाकी भारत जैसी ही हैं। खान-पान, भाषा-बोली, वेशभूषा, संगीत-नृत्य, पूजापाठ, पंथ के तरीके सब एकसे थे। जैसे-जैसे इनमें से कुछ राज्यों में भारत के इतर यानि विदेशी मजहब आए तब यहां की संस्कृति बदलने लगी
2500 सालों के इतिहास में सिर्फ हिंदुस्तान पर हुए हमले
इतिहास की पुस्तकों में पिछले 2500 वर्ष में जो भी आक्रमण हुए (यूनानी, यवन, हूण, शक, कुषाण, सिरयन, पुर्तगाली, फेंच, डच, अरब, तुर्क, तातार, मुगल व अंग्रेज) इन सभी ने हिंदुस्तान पर आक्रमण किया ऐसा इतिहासकारों ने अपनी पुस्तकों में कहा है। किसी ने भी अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, भूटान, पाकिस्तान, मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण का उल्लेख नहीं किया है।
रूस और ब्रिटिश शासकों ने बनाया अफगानिस्तान
1834 में प्रकिया शुरु हुई और 26 मई 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में निर्णय हुआ और अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट अर्थात् राजनैतिक देश को दोनों ताकतों के बीच स्थापित किया गया। इससे अफगानिस्तान अर्थात पठान भारतीय स्वतंत्रतता संग्राम से अलग हो गए। दोनों ताकतों ने एक-दूसरे से अपनी रक्षा का मार्ग भी खोज लिया। परंतु इन दोनों पूंजीवादी व मार्क्सवादी ताकतों में अंदरूनी संघर्ष सदैव बना रहा कि अफगानिस्तान पर नियंत्रण किसका हो? अफगानिस्तान शैव व प्रकृति पूजक मत से बौद्ध मतावलम्बी और फिर विदेशी पंथ इस्लाम मतावलम्बी हो चुका था। बादशाह शाहजहां, शेरशाह सूरी व महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में उनके राज्य में कंधार (गंधार) आदि का स्पष्ट वर्णन मिलता है
1904 में दिया आजाद रेजीडेंट का दर्जा
मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बडे राज्यों को संगठित कर पृथ्वी नारायण शाह नेपाल नाम से एक राज्य बना चुके थे। स्वतंत्रतता संग्राम के सेनानियों ने इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध लडते समय-समय पर शरण ली थी। अंग्रेज ने विचारपूर्वक 1904 में वर्तमान के बिहार स्थित सुगौली नामक स्थान पर उस समय के पहाड़ी राजाओं के नरेश से संधी कर नेपाल को एक आजाद देश का दर्जा प्रदान कर अपना रेजीडेंट बैठा दिया। इस प्रकार से नेपाल स्वतन्त्र राज्य होने पर भी अंग्रेज के अप्रत्यक्ष अधीन ही था। रेजीडेंट के बिना महाराजा को कुछ भी खरीदने तक की अनुमति नहीं थी। इस कारण राजा-महाराजाओं में यहां तनाव था। नेपाल 1947 में ही अंग्रेजी रेजीडेंसी से मुक्त हुआ।
भूटान के लिए ये चाल चली गई
1906 में सिक्किम व भूटान जो कि वैदिक-बौद्ध मान्यताओं के मिले-जुले समाज के छोटे भू-भाग थे इन्हें स्वतन्त्रता संग्राम से लगकर अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण से रेजीडेंट के माध्यम से रखकर चीन के विस्तारवाद पर अंग्रेज ने नजर रखना शुरु किया। यहां के लोग ज्ञान (सत्य, अहिंसा, करुणा) के उपासक थे। यहां खनिज व वनस्पति प्रचुर मात्रा में थी। यहां के जातीय जीवन को धीरे-धीरे मुख्य भारतीय धारा से अलग कर मतांतरित किया गया। 1836 में उत्तर भारत में चर्च ने अत्यधिक विस्तार कर नए आयामों की रचना कर डाली। फिर एक नए टेश का निर्माण हो गया।
चीन ने किया कब्जा
1914 में तिब्बत को केवल एक पार्टी मानते हुए चीन भारत की ब्रिटिश सरकार के बीच एक समझौता हुआ। भारत और चीन के बीच तिब्बत को एक बफर स्टेट के रूप में मान्यता देते हुए हिमालय को विभाजित करने के लिए मैकमोहन रेखा निर्माण करने का निर्णय हुआ। हिमालय को बांटना और तिब्बत व भारतीय को अलग करना यह षड्यंत्र रचा गया। चीनी और अंग्रेज शासकों ने एक-दूसरों के विस्तारवादी, साम्राज्यवादी मनसूबों को लगाम लगाने के लिए कूटनीतिक खेल खेला।
अंग्रेजों ने अपने लिए बनाया रास्ता
1935 व 1937 में ईसाई ताकतों को लगा कि उन्हें कभी भी भारत व एशिया से जाना पड़ सकता है। समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठाने, उसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतंत्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन 1965 में श्रीलंका व सन 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दी। म्यांमार व श्रीलंका का अलग अस्तित्व प्रदान करते ही मतान्तरण का पूरा ताना-बाना जो पहले तैयार था उसे अधिक विस्तार व सुदृढ़ता भी इन देशों में प्रदान की गई। ये दोनों देश वैदिक, बौद्ध धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले हैं। म्यांमार के अनेक स्थान विशेष रूप से रंगून का अंग्रेज द्वारा देशभक्त भारतीयों को कालेपानी की सजा देने के लिए जेल के रूप में भी उपयोग होता रहा है
दो देश से हुए तीन
1947 में भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। इसकी पटकथा अंग्रेजों ने पहले ही लिख दी थी। सबसे ज्यादा खराब स्थिति भौगोलिक रूप से पाकिस्तान की थी। ये देश दो भागों में बंटा हुआ था और दोनों के बीच की दूरी थी 2500 किलो मीटर। 16 दिसंबर 1971 को भारत के सहयोग से एक अलग देश बांग्लादेश अस्तित्व में आया।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

चाय बेचने वाले की बेटी बनी जज, कहा- जज्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं

रिज़ल्ट के बाद श्रुति को सम्मानित किया गया।पंजाब में चाय बेचकर परिवार चलाने वाले की बेटी श्रुति ने जज बनकर सोसायटी में मिसाल कायम की है। सक्सेस पर श्रुति ने कहा - जज्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं।
चायवाले की बेटी बनी जज?
सुरिंदर कुमार जालंधर में कोर्ट के बाहर चाय की दुकान चलाते हैं। श्रुति उन्हीं की बेटी है। चायवाले की बेटी ने मेहनत करके पिता का नाम रोशन कर दिया है। उसने ज्युडिशियल पोस्ट के लिए पंजाब सिविल सर्विसेज की ओर से ऑर्गनाइज एग्जाम क्लियर किया। बुधवार को रिजल्ट जारी हुआ। श्रुति ने एससी कैटेगरी में पंजाब में पहला स्थान हासिल किया।
पिता की खुशी का ठिकाना नहीं
- सुरिंदर ने कहा, बेटी कुछ बड़ा तो करना चाहती थी, पर जज बनेगी, ऐसा कभी सोचा न था।
- बेटी की इस सफलता पर पिता की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है।
- उधर, श्रुति ने कहा - मेरी कामयाबी के के पीछे मां-बाप की कड़ी मेहनत का रोल है।
- उसकी ये अचीवमेंट संसाधनों के अभाव में लोगों को कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दती है।
पंजाबी यूनिवर्सिटी से एलएलएम
श्रुति ने कहा, अब मेरी बारी है। ताया तीर्थ राम ने भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। जब मन में कुछ करने का जज्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं रहता। श्रुति ने स्टेट पब्लिक स्कूल से मैट्रिक के बाद जालंधर के जीएनडीयू से लॉ की पढ़ाई की थी। उसने एलएलएम पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से की।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

ये है फ्री बेसिक्स सर्विस, FACEBOOK आपको कभी नहीं बताएगा 5 बातें

ये है फ्री बेसिक्स सर्विस, FACEBOOK आपको कभी नहीं बताएगा 5 बातें
गैजेट डेस्क। इन दिनों फेसबुक की फ्री बेसिक्स सर्विस को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। फेसबुक का दावा है कि इससे भारत में इंटरनेट एक्सेस को बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन क्या सच यही है? हम बता रहे हैं फ्री बेसिक्स से जुड़े ऐसे 5 फैक्ट्स जो फेसबुक आपको कभी नहीं बताएगा :
1. फ्री बेसिक्स से महंगा होगा इंटरनेट
फेसबुक का दावा है कि फ्री बेसिक सर्विस से इंटरनेट फ्री होगा। लेकिन यह सच नहीं है। इस सर्विस के लिए पैसे टेलिकॉम ऑपरेटर देंगे। लेकिन ये ऑपरेटर पैसे कहां से लाएंगे? टेलिकॉम ऑपरेटर्स को पैसा यूजर्स से ही मिलता है। तो आशंका यही कि टेलिकॉम ऑपरेटर दूसरी इंटरनेट सर्विसेज के दाम बढ़ाकर इसकी भरपाई करेंगे। यानी घाटे में कंज्यूमर्स ही रहेंगे।
2. केवल फेसबुक और उसके पाटर्नर्स को मिलेगा फायदा
दावे के विपरीत फ्री बेसिक्स से अधिक से अधिक लोग इंटरनेट से नहीं जुड़ेंगे। इसका मकसद केवल फेसबुक और उसके पाटर्नर्स तक फ्री एक्सेस पहुंचाना है। इससे फेसबुक और उसके पार्टनर्स को काम्पिटिटिव एज मिलेगा। यह सीधे-सीधे नेट न्यूट्रैलिटी का वायलेशन होगा।
3. फेसबुक का हो जाएगा राज
फ्री बेसिक्स ओपन प्लेटफार्म नहीं है। फ्री बेसिक्स की गाइडलाइन केवल फेसबुक ने डिफाइन की है और इसे कभी भी बदलने का अधिकार भी केवल उसके पास है। यानी इंटरनेट एक्सेस के प्लेटफार्म पर धीरे-धीरे फेसबुक का ही राज हो जाएगा।
4. फ्री बेसिक्स अकेली सर्विस नहीं
अगर मकसद केवल फ्री इंटरनेट सर्विस ही देना है तो फिर दूसरे भी कई ऐसे मॉडल्स हैं जो सफल रहे हैं। इसमें यूजर्स को कुछ विज्ञापन देखने के बदले फ्री इंटरनेट एक्सेस मिलती है। इस मॉडल से फेसबुक और उसके पाटर्नर्स को गैर जरूरी फायदा भी नहीं मिलेगा और नेट न्यूट्रैलिटी का भी वायोलेशन नहीं होगा।
5. अपने आप बढ़ रहे हैं नेट यूजर्स
फेसबुक का यह दावा भी गलत है कि इससे अधिक से अधिक लोग इंटरनेट से जुड़ सकेंगे। भारत में इंटरनेट एक्सेस में पहले से ही काफी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। अकेले 2015 में ही देश में दस करोड़ नए इंटरनेट यूजर्स बढ़े हैं। ये सभी नए यूजर्स फ्री बेसिक्स सर्विस की वजह से नहीं जुड़े हैं।
क्या है फ्री बेसिक्स
फेसबुक के साथ रिलायंस कम्युनिकेशंस एक एप्लीकेशन के जरिए फ्री बेसिक्स इंटरनेट सर्विस दे रही थी। इस सर्विस को रिलायंस ने इसी साल अक्टूबर में लॉन्च किया था। लेकिन ट्राई के आदेश के बाद फिलहाल रिलायंस ने इसे होल्ड पर रख दिया है।
बता दें कि फेसबुक ने पहले इस सर्विस को इंटरनेट डॉट ओआरजी के नाम से लॉन्च किया था। लेकिन कई एक्सपर्ट्स ने इसे नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ बताया था। विरोध के बाद फेसबुक ने इसे Free Basics इंटरनेट के नाम से रिब्रांड किया।