सोमवार, 28 दिसंबर 2015

अब सड़कों पर पागलों जैसे घूमता है ये महान वैज्ञानिक

रविवार, 27 दिसंबर 2015

'पादना' बुरी बात नहीं है भाई !!



आज मैं ऐसे विषय पर बात कर रह हूँ , जो इंसान के इस पृथ्वी पर आगमन के समय से ही सदा बेहद उपयोगी परन्तु बेहद उपेक्षित विषय रहा है, और जिसका नाम लेना भी उसी तरह असभ्यता समझी जाती है । 
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इसको बच्चा बच्चा जानता है ....?
क्योंकि पाद ऐसा होता है जो शुरु से ही बच्चों का मनोरंजन करता है ।
और इसीलिये बच्चे कहीं भी पाद देते हैं..??
तब उन्हें बङे सिखाते हैं कि बेटा यूँ अचानक कहीं भी पाद देना उचित नहीं हैं..??
अब इन बङों को कौन सिखाये कि पादा भी क्या अपनी इच्छा से जाता है..?? 
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अरे वो तो खुद ही कभी भी कहीं भी आता है ।
अगर प्रधानमंत्री को भरी सभा में पाद आये तो पादेंगे नहीं क्या..?
इसलिये पाद पर किसी तरह का नियंत्रण संभव ही नहीं है । 
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आपका यदि डाक्टरी चेकअप हो ।
तो ध्यान दें ......
डाक्टर ने आपसे यह सवाल भी अवश्य किया होगा कि पाद ठीक से आता है... ?
क्योंकि डाक्टर जानता है कि पाद चेक करने की अभी तक कोई अल्ट्रासाउंड या एम.आर. आई. जैसी मशीन नहीं बनी...? 
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ये तमाम चूरन - चटनी हाजमोला जैसी गोलियों का करोङों रुपये का कारोबार केवल इसी बिन्दु पर तो निर्भर है कि जनता ठीक से पादती रहे ....? 
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यदि आपको दिन में 4 बार और रात को लगभग 10 बार अलग अलग तरह के पाद नहीं आते । तो आपके ये पाउडर लिपिस्टिक सब बेकार है । 
क्योंकि अन्दर से आपका सिस्टम बिगङ रहा है ।
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यदि लिवर ही ठीक से काम नहीं कर रहा तो अन्य अंगो को पोषण कहाँ से मिलेगा ।
इसलिये पादने में संकोच न करें और खूब पादें ।
क्योंकि पादना बुरी बात नहीं है भाई..? 
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🚶पादों के प्रकार .......
पादों के पांच प्रकार होते हैं:-
1- पादों का राजा है "भो पाद" ।
हमारे पूर्वज इसे उत्तम पादम् कहते थे । यह घोषणात्मक और मर्दानगी भरा होता है । इसमें आवाज में धमक ज्यादा और बदबू कम होती है । अतएव
जितनी जोर आवाज, उतना कम बदबू ...
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2- 'शहनाई' -
हमारे पूर्वजो ने इसे मध्यमा ही कहा है ।
इसमें से आवाज निकलती है ठें ठें या कहें पूंऊऊऊऊऊ .......
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3- 'खुरचनी'-
जिसकी आवाज पुराने कागज के सरसराहट जैसी होती है। यह एक बार में नई निकलती है। यह एक के बाद एक कई 'पिर्र..पिर्र..पिर्र..पिर्र' की आवाज के साथ आता है ।
यह ज्यादा गरिष्ठ खाने से होता है ।
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4- 'तबला' -
तबला अपनी उद्घोषणा केवल एक फट के आवाज के साथ करता है ।तबला एक खुदमुख्तार पाद है क्योंकि यह अपने मालिक के इजाजत के बगैर ही निकल जाता है । अगर बेचारा लोगों के बीच बैठा हो तो शर्म से पानी-पानी हो जाता है ।
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5- 'फुस्कीं' -
यह एक निःशब्द 'बदबू बम ' है ।
चूँकि इसमें आवाज नई होती है इसलिए ये पास बैठे व्यक्ति को बदबू का गुप्त दान देने के लिए बढ़िया है और दान देने वाला अपने नाक को बंद कर के मैने नई पादा है का दिखावा बङी आसानी से कर सकता है । लेकिन गुप्त दान देने के बाद जापानी कहावत " जो बोला , सो पादा " ......याद रखते हुए लोगों को खुद ही दाता को ताङने दीजिए ।
आप मत बोलिए । 
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अब अपने पाद की श्रेणी निर्धारित करते हुए पाद का आनन्द उठाइये जम कर बेझिझक और खुलकर पादीये ....... 
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नोट ;— इस मेसेज को केवल व्यंग्य के तौर पर न लें जी । आपके शरीर में होने वाली कई क्रियाओं का सम्बंध है पादने से ।

teacher par sansani khej nibandh.......


शनिवार, 26 दिसंबर 2015

ऐसे तोड़ा गया पूरा हिंदुस्तानः 1857 से 1947 के बीच बने 7 नए देश

अखंड भारत का नक्शा।

 1857 से 1947 तक हिंदुस्तान के कई टुकड़े कर अंग्रेजों ने सात नए देश बना दिए थे। 1947 में बना पाकिस्तान भारतवर्ष का पिछले 2500 सालों में 24वां विभाजन था।
आज तक किसी भी इतिहास की पुस्तक में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता की बीते 2500 सालों में हिंदुस्तान पर जो आक्रमण हुए उनमें किसी भी आक्रमणकारी ने अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, भूटान, पाकिस्तान, मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया हो। अब यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह देश कैसे गुलाम और आजाद हुए। पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। बाकी देशों के इतिहास की चर्चा नहीं होती। हकीकत में अंखड भारत की सीमाएं विश्व के बहुत बड़े भू-भाग तक फैली हुई थीं।
(स्रोत- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार के अखंड भारत के खंडन का इतिहास लेख पर आधारित। फोटो इंटरनेट)
एवरेस्ट का नाम था सागरमाथा, गौरीशंकर चोटी
पृथ्वी का जब जल और थल इन दो तत्वों में वर्गीकरण करते हैं, तब सात द्वीप एवं सात महासमुद्र माने जाते हैं। हम इसमें से प्राचीन नाम जम्बूद्वीप जिसे आज एशिया द्वीप कहते हैं तथा इन्दू सरोवरम् जिसे आज हिन्दू महासागर कहते हैं, के निवासी हैं। इस जम्बूद्वीप (एशिया) के लगभग मध्य में हिमालय पर्वत स्थित है। हिमालय पर्वत में विश्व की सर्वाधिक ऊंची चोटी सागरमाथा, गौरीशंकर हैं, जिसे 1835 में अंग्रेज शासकों ने एवरेस्ट नाम देकर इसकी प्राचीनता व पहचान को बदल दिया।
ये थीं अखंड भारत की सीमाएं
इतिहास की किताबों में हिंदुस्तान की सीमाओं का उत्तर में हिमालय व दक्षिण में हिंद महासागर का वर्णन है, परंतु पूर्व व पश्चिम का वर्णन नहीं है। परंतु जब श्लोकों की गहराई में जाएं और भूगोल की पुस्तकों और एटलस का अध्ययन करें तभी ध्यान में आ जाता है कि श्लोक में पूर्व व पश्चिम दिशा का वर्णन है। कैलाश मानसरोवर‘ से पूर्व की ओर जाएं तो वर्तमान का इंडोनेशिया और पश्चिम की ओर जाएं तो वर्तमान में ईरान देश या आर्यान प्रदेश हिमालय के अंतिम छोर पर हैं।
एटलस के अनुसार जब हम श्रीलंका या कन्याकुमारी से पूर्व व पश्चिम की ओर देखेंगे तो हिंद महासागर इंडोनेशिया व आर्यान (ईरान) तक ही है। इन मिलन बिंदुओं के बाद ही दोनों ओर महासागर का नाम बदलता है। इस प्रकार से हिमालय, हिंद महासागर, आर्यान (ईरान) व इंडोनेशिया के बीच का पूरे भू-भाग को आर्यावर्त अथवा भारतवर्ष या हिंदुस्तान कहा जाता है
अब तक 24 विभाजन
सन 1947 में भारतवर्ष का पिछले 2500 सालों में 24वां विभाजन है। अंग्रेज का 350 वर्ष पूर्व के लगभग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में व्यापारी बनकर भारत आना, फिर धीरे-धीरे शासक बनना और उसके बाद 1857 से 1947 तक उनके द्वारा किया गया भारत का 7वां विभाजन है। 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग किमी था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग किमी है। पड़ोसी 9 देशों का क्षेत्रफल 50 लाख वर्ग किमी बनता है।
क्या थी अखंड भारत की स्थिति
सन 1800 से पहले विश्व के देशों की सूची में वर्तमान भारत के चारों ओर जो आज देश माने जाते हैं उस समय ये देश थे ही नहीं। यहां राजाओं का शासन था। इन सभी राज्यों की भाषा अधिकांश शब्द संस्कृत के ही हैं। मान्यताएं व परंपराएं बाकी भारत जैसी ही हैं। खान-पान, भाषा-बोली, वेशभूषा, संगीत-नृत्य, पूजापाठ, पंथ के तरीके सब एकसे थे। जैसे-जैसे इनमें से कुछ राज्यों में भारत के इतर यानि विदेशी मजहब आए तब यहां की संस्कृति बदलने लगी
2500 सालों के इतिहास में सिर्फ हिंदुस्तान पर हुए हमले
इतिहास की पुस्तकों में पिछले 2500 वर्ष में जो भी आक्रमण हुए (यूनानी, यवन, हूण, शक, कुषाण, सिरयन, पुर्तगाली, फेंच, डच, अरब, तुर्क, तातार, मुगल व अंग्रेज) इन सभी ने हिंदुस्तान पर आक्रमण किया ऐसा इतिहासकारों ने अपनी पुस्तकों में कहा है। किसी ने भी अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, भूटान, पाकिस्तान, मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण का उल्लेख नहीं किया है।
रूस और ब्रिटिश शासकों ने बनाया अफगानिस्तान
1834 में प्रकिया शुरु हुई और 26 मई 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में निर्णय हुआ और अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट अर्थात् राजनैतिक देश को दोनों ताकतों के बीच स्थापित किया गया। इससे अफगानिस्तान अर्थात पठान भारतीय स्वतंत्रतता संग्राम से अलग हो गए। दोनों ताकतों ने एक-दूसरे से अपनी रक्षा का मार्ग भी खोज लिया। परंतु इन दोनों पूंजीवादी व मार्क्सवादी ताकतों में अंदरूनी संघर्ष सदैव बना रहा कि अफगानिस्तान पर नियंत्रण किसका हो? अफगानिस्तान शैव व प्रकृति पूजक मत से बौद्ध मतावलम्बी और फिर विदेशी पंथ इस्लाम मतावलम्बी हो चुका था। बादशाह शाहजहां, शेरशाह सूरी व महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में उनके राज्य में कंधार (गंधार) आदि का स्पष्ट वर्णन मिलता है
1904 में दिया आजाद रेजीडेंट का दर्जा
मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बडे राज्यों को संगठित कर पृथ्वी नारायण शाह नेपाल नाम से एक राज्य बना चुके थे। स्वतंत्रतता संग्राम के सेनानियों ने इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध लडते समय-समय पर शरण ली थी। अंग्रेज ने विचारपूर्वक 1904 में वर्तमान के बिहार स्थित सुगौली नामक स्थान पर उस समय के पहाड़ी राजाओं के नरेश से संधी कर नेपाल को एक आजाद देश का दर्जा प्रदान कर अपना रेजीडेंट बैठा दिया। इस प्रकार से नेपाल स्वतन्त्र राज्य होने पर भी अंग्रेज के अप्रत्यक्ष अधीन ही था। रेजीडेंट के बिना महाराजा को कुछ भी खरीदने तक की अनुमति नहीं थी। इस कारण राजा-महाराजाओं में यहां तनाव था। नेपाल 1947 में ही अंग्रेजी रेजीडेंसी से मुक्त हुआ।
भूटान के लिए ये चाल चली गई
1906 में सिक्किम व भूटान जो कि वैदिक-बौद्ध मान्यताओं के मिले-जुले समाज के छोटे भू-भाग थे इन्हें स्वतन्त्रता संग्राम से लगकर अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण से रेजीडेंट के माध्यम से रखकर चीन के विस्तारवाद पर अंग्रेज ने नजर रखना शुरु किया। यहां के लोग ज्ञान (सत्य, अहिंसा, करुणा) के उपासक थे। यहां खनिज व वनस्पति प्रचुर मात्रा में थी। यहां के जातीय जीवन को धीरे-धीरे मुख्य भारतीय धारा से अलग कर मतांतरित किया गया। 1836 में उत्तर भारत में चर्च ने अत्यधिक विस्तार कर नए आयामों की रचना कर डाली। फिर एक नए टेश का निर्माण हो गया।
चीन ने किया कब्जा
1914 में तिब्बत को केवल एक पार्टी मानते हुए चीन भारत की ब्रिटिश सरकार के बीच एक समझौता हुआ। भारत और चीन के बीच तिब्बत को एक बफर स्टेट के रूप में मान्यता देते हुए हिमालय को विभाजित करने के लिए मैकमोहन रेखा निर्माण करने का निर्णय हुआ। हिमालय को बांटना और तिब्बत व भारतीय को अलग करना यह षड्यंत्र रचा गया। चीनी और अंग्रेज शासकों ने एक-दूसरों के विस्तारवादी, साम्राज्यवादी मनसूबों को लगाम लगाने के लिए कूटनीतिक खेल खेला।
अंग्रेजों ने अपने लिए बनाया रास्ता
1935 व 1937 में ईसाई ताकतों को लगा कि उन्हें कभी भी भारत व एशिया से जाना पड़ सकता है। समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठाने, उसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतंत्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन 1965 में श्रीलंका व सन 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दी। म्यांमार व श्रीलंका का अलग अस्तित्व प्रदान करते ही मतान्तरण का पूरा ताना-बाना जो पहले तैयार था उसे अधिक विस्तार व सुदृढ़ता भी इन देशों में प्रदान की गई। ये दोनों देश वैदिक, बौद्ध धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले हैं। म्यांमार के अनेक स्थान विशेष रूप से रंगून का अंग्रेज द्वारा देशभक्त भारतीयों को कालेपानी की सजा देने के लिए जेल के रूप में भी उपयोग होता रहा है
दो देश से हुए तीन
1947 में भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। इसकी पटकथा अंग्रेजों ने पहले ही लिख दी थी। सबसे ज्यादा खराब स्थिति भौगोलिक रूप से पाकिस्तान की थी। ये देश दो भागों में बंटा हुआ था और दोनों के बीच की दूरी थी 2500 किलो मीटर। 16 दिसंबर 1971 को भारत के सहयोग से एक अलग देश बांग्लादेश अस्तित्व में आया।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

चाय बेचने वाले की बेटी बनी जज, कहा- जज्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं

रिज़ल्ट के बाद श्रुति को सम्मानित किया गया।पंजाब में चाय बेचकर परिवार चलाने वाले की बेटी श्रुति ने जज बनकर सोसायटी में मिसाल कायम की है। सक्सेस पर श्रुति ने कहा - जज्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं।
चायवाले की बेटी बनी जज?
सुरिंदर कुमार जालंधर में कोर्ट के बाहर चाय की दुकान चलाते हैं। श्रुति उन्हीं की बेटी है। चायवाले की बेटी ने मेहनत करके पिता का नाम रोशन कर दिया है। उसने ज्युडिशियल पोस्ट के लिए पंजाब सिविल सर्विसेज की ओर से ऑर्गनाइज एग्जाम क्लियर किया। बुधवार को रिजल्ट जारी हुआ। श्रुति ने एससी कैटेगरी में पंजाब में पहला स्थान हासिल किया।
पिता की खुशी का ठिकाना नहीं
- सुरिंदर ने कहा, बेटी कुछ बड़ा तो करना चाहती थी, पर जज बनेगी, ऐसा कभी सोचा न था।
- बेटी की इस सफलता पर पिता की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है।
- उधर, श्रुति ने कहा - मेरी कामयाबी के के पीछे मां-बाप की कड़ी मेहनत का रोल है।
- उसकी ये अचीवमेंट संसाधनों के अभाव में लोगों को कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दती है।
पंजाबी यूनिवर्सिटी से एलएलएम
श्रुति ने कहा, अब मेरी बारी है। ताया तीर्थ राम ने भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। जब मन में कुछ करने का जज्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं रहता। श्रुति ने स्टेट पब्लिक स्कूल से मैट्रिक के बाद जालंधर के जीएनडीयू से लॉ की पढ़ाई की थी। उसने एलएलएम पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से की।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

ये है फ्री बेसिक्स सर्विस, FACEBOOK आपको कभी नहीं बताएगा 5 बातें

ये है फ्री बेसिक्स सर्विस, FACEBOOK आपको कभी नहीं बताएगा 5 बातें
गैजेट डेस्क। इन दिनों फेसबुक की फ्री बेसिक्स सर्विस को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। फेसबुक का दावा है कि इससे भारत में इंटरनेट एक्सेस को बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन क्या सच यही है? हम बता रहे हैं फ्री बेसिक्स से जुड़े ऐसे 5 फैक्ट्स जो फेसबुक आपको कभी नहीं बताएगा :
1. फ्री बेसिक्स से महंगा होगा इंटरनेट
फेसबुक का दावा है कि फ्री बेसिक सर्विस से इंटरनेट फ्री होगा। लेकिन यह सच नहीं है। इस सर्विस के लिए पैसे टेलिकॉम ऑपरेटर देंगे। लेकिन ये ऑपरेटर पैसे कहां से लाएंगे? टेलिकॉम ऑपरेटर्स को पैसा यूजर्स से ही मिलता है। तो आशंका यही कि टेलिकॉम ऑपरेटर दूसरी इंटरनेट सर्विसेज के दाम बढ़ाकर इसकी भरपाई करेंगे। यानी घाटे में कंज्यूमर्स ही रहेंगे।
2. केवल फेसबुक और उसके पाटर्नर्स को मिलेगा फायदा
दावे के विपरीत फ्री बेसिक्स से अधिक से अधिक लोग इंटरनेट से नहीं जुड़ेंगे। इसका मकसद केवल फेसबुक और उसके पाटर्नर्स तक फ्री एक्सेस पहुंचाना है। इससे फेसबुक और उसके पार्टनर्स को काम्पिटिटिव एज मिलेगा। यह सीधे-सीधे नेट न्यूट्रैलिटी का वायलेशन होगा।
3. फेसबुक का हो जाएगा राज
फ्री बेसिक्स ओपन प्लेटफार्म नहीं है। फ्री बेसिक्स की गाइडलाइन केवल फेसबुक ने डिफाइन की है और इसे कभी भी बदलने का अधिकार भी केवल उसके पास है। यानी इंटरनेट एक्सेस के प्लेटफार्म पर धीरे-धीरे फेसबुक का ही राज हो जाएगा।
4. फ्री बेसिक्स अकेली सर्विस नहीं
अगर मकसद केवल फ्री इंटरनेट सर्विस ही देना है तो फिर दूसरे भी कई ऐसे मॉडल्स हैं जो सफल रहे हैं। इसमें यूजर्स को कुछ विज्ञापन देखने के बदले फ्री इंटरनेट एक्सेस मिलती है। इस मॉडल से फेसबुक और उसके पाटर्नर्स को गैर जरूरी फायदा भी नहीं मिलेगा और नेट न्यूट्रैलिटी का भी वायोलेशन नहीं होगा।
5. अपने आप बढ़ रहे हैं नेट यूजर्स
फेसबुक का यह दावा भी गलत है कि इससे अधिक से अधिक लोग इंटरनेट से जुड़ सकेंगे। भारत में इंटरनेट एक्सेस में पहले से ही काफी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। अकेले 2015 में ही देश में दस करोड़ नए इंटरनेट यूजर्स बढ़े हैं। ये सभी नए यूजर्स फ्री बेसिक्स सर्विस की वजह से नहीं जुड़े हैं।
क्या है फ्री बेसिक्स
फेसबुक के साथ रिलायंस कम्युनिकेशंस एक एप्लीकेशन के जरिए फ्री बेसिक्स इंटरनेट सर्विस दे रही थी। इस सर्विस को रिलायंस ने इसी साल अक्टूबर में लॉन्च किया था। लेकिन ट्राई के आदेश के बाद फिलहाल रिलायंस ने इसे होल्ड पर रख दिया है।
बता दें कि फेसबुक ने पहले इस सर्विस को इंटरनेट डॉट ओआरजी के नाम से लॉन्च किया था। लेकिन कई एक्सपर्ट्स ने इसे नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ बताया था। विरोध के बाद फेसबुक ने इसे Free Basics इंटरनेट के नाम से रिब्रांड किया।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

नेत्रहीन दूल्हे को मिली दुल्हन, शादी की खुशी में गाया गाना

शादी के दौरान दीपमाला और  पांचाराम।
संगीत टीचर पांचाराम। नेत्रहीन। जीवन के सफर में साथी की तलाश पूरी हुई और वे दृष्टिहीन दीपमाला के साथ रिश्तों की डोर में बंध गए। रविवार को आर्य समाज मंदिर में पूरे रीति रिवाज के साथ उनका विवाह हुआ।
दूल्हे ने गाना भी सुनाया
दीपमाला ने संगीत का कोर्स पूरा किया है। शादी के बाद दूल्हा खुश था। उनसे जब हारमोनियम देकर गीत गाने का आग्रह किया तो उन्होंने लोगों को निराश नहीं किया। 'आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बनके, मेरे दिल में यूं ही रहना तुम बहार बनके' सुनाया। दुल्हन ने भी सुर से सुर मिलाए। इस पर लोगों ने खूब तालियां बजाई। जब वंस मोर की फरमाइश हुई तो दूल्हे ने प्रस्तुति दी...ना कजरे की धार...ना मोतियों का हार...तुम कितनी सुंदर हो...।
खुशी के माहौल में शादी
खुशी के माहौल में यह विवाह संपन्न हुआ। आर्य समाज के प्रधान गजेंद्र के आवास पर दूल्हा-दुल्हन को सजाया-संवारा गया। लोगों ने बर्तन, साड़ियां और अन्य उपहार देकर नव दंपती को आशीर्वाद दिया। समारोह में नेत्रहीन स्कूल की संचालक सहित उनके संगी-साथी और दूसरे लोग मौजूद थे।

बच्चों के स्कूल पर खर्च करते हैं आधी कमाई, 14 सालों से ऐसा कर रहा है चायवाला

दुकान पर चाय बनाते प्रकाश
चाय बेचने वाला एक शख्स पिछले 14 सालों से स्कूल चला रहा है। स्कूल में करीब 70 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल चलाने के लिए यह शख्स अपनी आय का आधा से अधिक हिस्सा खर्च कर देता है।
स्थानीय लोगों के बीच खास पहचान बना चुके इस शख्स का नाम डी प्रकाश है। प्रकाश के स्कूल में बच्चे नर्सरी से तीसरे क्लास तक पढ़ाई करते हैं। इसके बाद वे किसी सरकारी स्कूलों में चले जाते हैं।
ताकि मिल सके बच्चों को शिक्षा
प्रकाश ने बताया कि वे सात साल की उम्र से चाय बेचते हैं। उनके फैमिली के पास स्कूल की फीस के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने बचपन में ही तय कर लिया था कि ऐसे बच्चों के लिए स्कूल खोलना है जो पैसे की कमी के चलते स्कूल नहीं जा पाते।
बच्चों में कुपोषण देख हुए प्रेरित
डी प्रकाश ने बताया कि वैसे तो उनका सपना बचपन से ही गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोलने का था। लेकिन जब उन्होंने अपने पास के स्कूल के बच्चों में कुपोषण देखी तो स्कूल खोलने का फैसला कर लिया।
मीड डे मिल में देते हैं दूध बिस्किट
प्रकाश ने बताया कि बच्चों को मीड डे मील के तहत 100 एमएल दूध और बिस्किट दिया जाता है।

उन्होंने बताया कि वह साल 1976 के बाद से ब्लड भी डोनेट करते हैं

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

साधु से बने अरबपति, अब देंगे भारत के लाखों घरों में फ्री में बिजली

फाइल फोटो- मनोज भार्गव अपनी बिजली बनाने वाली साइकिल चलाते हुए।

ये हैं मनोज भार्गव, अमेरिका के रईस भारतीयों में इनकी गिनती होती है। साल 2010 से पहले कम लोग ही उन्हें जानते थे। 2012 में फोर्ब्स मैगजीन ने करोड़पतियों की लिस्ट में उनका नाम शामिल किया तब सबकी निगाहें उनकी तरफ गईं। मनोज को उत्तराखंड से बेहद लगाव है अपना बिजनेस शुरू करने से पहले यहां के कई मठों में साधु की तरह रहे। वह दिल्ली के हंसलोक आश्रम में करीब 12 साल तक रहे। मनोज इन दिनों भारत के करीब 20 लाख लोगों को फ्री बिजली देने वाले प्रोजेक्ट पर काम कर कर रहे हैं। इसकी शुरुआत अगले साल से उत्तराखंड के 20 गांवों से होने जा रही है।

साइकिल से बनेगी बिजली
- मनोज द्वारा बनाई गई साइकिल में एक घंटे पैडल मारने से पूरे दिनभर घरेलू उपकरण चलाने लायक बिजली आसानी से मिल सकती है।
- जहां बिजली नहीं है, वहां लोग इससे 25 एलईडी बल्ब जला सकते हैं। सेलफोन चार्ज कर सकते हैं। छोटा पंखा चला सकते हैं।
- मनोज भार्गव की प्रयोगशाला ने 2015 में मेकैनिकल एनर्जी को इलेक्ट्रीकल एनर्जी में बदलने पर काम शुरू किया है।
मेकैनिकल एनर्जी को बदला इलेक्ट्रीकल में
साइकिल से बिजली बनने की तकनीक का उपयोग अभी तक सिर्फ साइकिल की लाइट जलाने तक ही सीमित रहा है। लेकिन मनोज ने इस तकनीक को विकसित करके भारत के उन घरों को रोशन करने का जिम्मा उठाया है जो आज भी बिजली से महरूम हैं। अमेरिका के एनर्जी ड्रिंक व्यापारी मनोज भार्गव ने साइकिल पर आधारित एक मशीन तैयार की है। इसे कसरत करने वाली साइकिल भी कहा जा सकता है। भार्गव की इस मशीन से साइकिल से बिजली पैदा की जा सकती है। मेकैनिकल एनर्जी को इलेक्ट्रीकल एनर्जी में बदलने की एक मशीन से एनर्जी को इकट्ठा किया जा सकता है और पूरे 24 घंटे इससे घर में बिजली रह सकती है।

साधारण साइकिल की तरह
भार्गव ने इस “फ्री इलेक्ट्रिक” बाइक का पेटेंट करवाया है। जल्द ही इसका बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू होने जा रहा है। भारत की कई बड़ी कंपनियां भार्गव के साथ काम करना चाहती हैं।
खास बात यह है कि इस साइकिल के 70 प्रतिशत पुर्जे सामान्य साइकिल जैसे ही हैं। भार्गव चाहते हैं कि मार्च 2016 में वे भारत में इसकी पहली उत्पादन इकाई स्थापित कर दें जहां रोजाना 1000 साइकिल बनाई जाएं।
क्यों है जरूरत
- अभी भारत के 32000 से ज्यादा गांवों में बिजली नहीं है। 10 लाख से ज्यादा परिवार अंधेरे में रहते हैं।
- एक साइकिल की कीमत 12,000 रुपए के करीब रहेगी।
- पहले चरण में उत्तराखंड में काम होगा।

लखनऊ में हुआ था जन्म
मनोज भार्गव का जन्म 1952 में लखनऊ में हुआ। जब उनके पिता 1967 में अमेरिका में अपनी पीएचडी करने गए तो उन्हें साथ ले गए। वह पढऩे में तेज थे, लेकिन उन्होंने पढऩे से ज्यादा अपने सपनों को अपनी तरह साकार करना सही समझा। उन्होंने अमेरिका के मशहूर प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में गणित में ग्रैजुएशन के लिए एडमिशन लिया, लेकिन पहले साल पढ़ाई करने के बाद यूनिवर्सिटी छोड़ दी।

5 Hour Energy ड्रिंक की खोज
एक बार मनोज नई टेक्नालॉजी की खोज में किसी व्यापार मेले गए हुए थे। सुबह से लगातार कई मीटिंग करने के कारण वो काफी थक गए। जिन लोगों के साथ अगली मीटिंग थी उनसे मनोज ने कुछ पीने के लिए मांगा ताकि थोड़ी एनर्जी आ सके। उन्हें गिलास में कुछ पीने ले लिए दिया गया। इसे पीने के बाद वे अगले 7-8 घंटे तक तरोताजा रहे और बड़ी आसानी से अपना काम कर पाए। मनोज ने मन ही मन सोचा ये शानदार है, मैं इसे बेच सकता हूं। और फिर अगले 30 दिनों में उन्होंने अपने एनर्जी ड्रिंक का फार्मूला तैयार किया जिसका नाम, “5-hour Energy” रखा गया। बाजार में उनका एनर्जी ड्रिंक आते ही थोड़े दिनों बाद ही अमेरिका में सबसे ज्यादा बिकने वाला एनर्जी ड्रिंक बन गया।

रविवार, 6 दिसंबर 2015

अयोध्या में कभी नहीं था राम मंदिर और न बाबरी मस्जिद!

फाइल फोटो- बाबरी मस्जिद।

करीब चार साल पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना था कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाकी ने 1528 में तुड़वाकर वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था। इसी तथ्य को आधार बनाकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ये फैसला सुनाया था।
पुरातत्व विभाग भारत की रिपोर्ट इस फैसले में अहम सबूत बनी थी जिसमें कहा गया था कि आयोध्या में जिस स्थान पर मस्जिद थी उसे किसी हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। देश के वरिष्ठ पत्रकार एवं उपन्यासकार स्वर्गीय कमलेश्वर के सन् 2000 में प्रकाशित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में उन्होंने तथ्यों के हवाला देते हुए बताया गया है कि अयोध्या में न कभी बाबरी मस्जिद नाम की मस्जिद थी और न ही राम मंदिर।
अंग्रेजों ने बोया विवाद का बीज
अयोध्या में इस जगह को लेकर सन 1949 से देश में विवाद है। वहां न बाबरी मस्जिद थी और न ही राम मंदिर। क़िताब में कमलेश्वर ने बताया है कि भारत में हिंदू और मुसलमानों में विवाद का यह बीज अंग्रेज़ों ने बोया था। इसकी शुरुआत 1947 में देश के विभाजन के रूप में हुई थी। कमलेश्वर ने इस उपन्यास की शुरुआत रामजन्म भूमि आंदोलन शुरू होने के बाद से की थी। करीब बारह साल के रिसर्चके बाद ऐतिहासिक तथ्यों को तफ्तीश के बाद बाद ‘कितने पाकिस्तान’ को लिखा है। उन्होंने क़िताब में बताने की कोशिश की है कि वहां बाबरी मस्जिद या राम मंदिर नहीं था।

अटलजी की सरकार ने किया था पुरस्कृत
अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में क़िताब को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। उस समय एचआरडी मिनिस्टर हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के एक बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी थे। माना जाता है कि कोई सरकार किसी क़िताब को पुरस्कृत तब करती है जब वह सरकार क़िताब में लिखी हर बात से सहमत होती है। कमलेश्वर ने बड़ी ख़ूबसूरती से समय और किरदार की सीमाओं से परे ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना की है। मुख्य किरदार अदीब यानी लेखक ‘समय की अदालत’ लगाता है, जिसमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू, अली बंधु, लार्ड माउंटबेटन, बाबर, हुमायूं, औरंगजेब, कबीर जैसे सैकड़ों ऐतिहासिक किरदारों ने ख़ुद अपने-अपने बयान दर्ज कराए हैं।

बाबर के समय से ही थी मस्जिद
यही नहीं अदालत में कई दर्जन विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भी हर विवादास्पद घटनाओं पर अपना बयान दिया है। सभी बयानात इतिहास, अंग्रेजों द्वारा तैयार गजेटियर, पुरातात्विक दस्तावेज़ों और नामचीन हस्तियों की आत्मकथाओं में उपलब्ध जानकारियों पर आधारित हैं। किताब में कई चैप्टर अयोध्या विवाद से जुड़े हैं। इसके अनुसार अयोध्या में मस्जिद बाबर के भारत पर आक्रमण करने से पहले ही मौजूद थी। बाबर 20 अप्रैल 1526 को इब्राहिम का सिर कलम करके आगरा की गद्दी पर बैठा था और हफ़्ते भर बाद 27 अप्रैल 1526 को उसके नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया।

अंग्रेजों ने नष्ट कराया शिलालेख
क़िताब के मुताबिक, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं) में एक शिलालेख बनाया गया था, जिसका जिक्र ब्रिटिश अफ़सर ए फ्यूहरर ने कई जगह किया है। फ्यूहरर ने 1880 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा था, जिसे बाद में अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के शासन में उसी के आदेश पर 1523 में शुरू हुआ और 1524 में मस्जिद पूरी हुई।

खाली जगह पर बनाई गई थी मस्जिद

शिलालेख के मुताबिक मस्जिद ख़ाली जगह पर बनाई गई थी। इसका यह भी मतलब होता है कि अगर विवादित स्थल पर राम या किसी दूसरे देवता का मंदिर था, जिसके अवशेष खुदाई करने वालों को मिले हैं। उसे 14वीं सदी से पहले तोड़ दिया गया होगा। या फिर ख़ुद ही नष्ट हो गया होगा। उसे कम से कम बाबर या मीरबाकी ने नहीं तुड़वाया होगा।

दो अंग्रेज अफसरों की है करतूत

कमलेश्वर की ‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में अंग्रेज अफसर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। साजिशकर्ता वही थी। बाद में उसने ही फैजाबाद का गजेटियर तैयार किया था। इस साजिश में एक अफसर कनिंघम भी शामिल था। इसको अंग्रेज सरकार ने हिंदुस्तान की पुरानी इमारतों की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी थी। क़िताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद नींव रखी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमले के दौरान लड़ाई में बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हजार हिंदुओं को मार दिया।

तो क्या गजेटिर में गलत जानकारी है

फैजाबाद के गजेटियर में 1869 में, बाबर के कथित आक्रमण के करीब साढ़े तीन सौ साल बाद, अयोध्या- फैजाबाद की आबादी दस हजार थी। 1881 में ये साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों की हत्या कैसे की। अंग्रेज अफसरों ने बाबर की डायरी बाबरनामा से तीन अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच 20 से ज्यादा पेज ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी‘औध’ को ‘अयोध्या’ कर दिया। मगर मस्जिद के शिलालेख के फ्यूहरर के अनुवाद को ग़ायब करना ये दोनों अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी जियोल़ाजिकल इंडिया की फाइल में है।

अंग्रेज क्या चाहते थे

‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने दावा किया है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ चौकन्ने हो गए थे और ब्रिटिश इंडिया की नई पॉलिसी बनी, जिसके मुताबिक अंग्रेजों ने तय किया कि अगर इस उपमहाद्वीप पर लंबे समय तक शासन करना है, तो इसे धर्म के आधार पर विभाजित करना होगा। ताकि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से ही लड़ते रहें और उनका ध्यान आज़ादी जैसे मुद्दों पर न जाए। इसी नीति के तहत लोदी की मस्जिद ‘बाबरी मस्जिद’ बना दी गई और उसे ‘राम मंदिर’ से जोड़कर ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो कभी हल ही नहीं हो।


शनिवार, 5 दिसंबर 2015

VID 20150512 WA0005

दुनिया में पहली बार इस तरह से मिली भालू को मर्सी किलिंग

सोनू की अंतिम विदाई में उमड़ी भीड़।


कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय में शनिवार दोपहर ​विश्व में पहली बार किसी भालू को क्लीनिकल प्रक्रिया से दया मृत्यु [मर्सी किलिंग] दी गई। भालू सोनू को मौत की नींद सुलाने की प्रक्रिया सुबह 11.22 बजे शरू हुई। गौरतलब है कि इससे पहले अमेरिका के काेलोरेडो और ग्लेशियर नेशनल पार्क में दो काले भालुओं की मर्सी कीलिंग की गई थी, लेकिन उन्हें मारने के लिए क्लीनिकल प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी, जबकि सोनू को दया मृत्यु देने के लिए वर्ल्ड सोसाइटी फॉर दी प्रोटेक्शन ऑफ एनिमल की गाइड लाइन को फॉलो किया गया।
- सुबह 10 बजे महामंडलेश्वर लक्ष्मणदास जी महाराज की मौजूदगी में 11 पंड़ितों ने सोनू को गीता के श्लोक सुनाए। इसके बाद गंगाजल और तुलसी दल दिया गया।
- सुबह साढ़े 11 बजे पिंजरे में मेकसेल्फ नामक केमिकल के तीन इंजेक्शन लगाए गए और फिर कुछ देर के लिए पिंजरा ढंक दिया गया।
- पूरी तरह से बेहोश होने के बाद सोनू को पिंजरे से निकालकर बाहर लाया गया।
- सलाइन के ज़रिए मैग्निशियम सल्फेट (मौत की दवाई) चढ़ाया गया।
- करीब एक घंटे बाद सोनू की धड़कने थम गईं।
- इसके बाद भालू सोनू का पीएम किया गया और फिर उसे जू में ही दफना दिया गया।
- गौरतलब है कि पिछले दो सालों से लकवे के कारण सोनू के शरीर का निचला हिस्सा काम नहीं कर रहा था और उसे असहनीय दर्द बना रहता था।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

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ठंड में पुरुषों को खाना चाहिए अखरोट, ये हैं इसके फायदे

ठंड में पुरुषों को खाना चाहिए अखरोट, ये हैं इसके फायदे

सर्दियों में अखरोट स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत ही अच्छा माना जाता है। अखरोट में फाइबर, विटामिन बी, मैग्नीशियम और एंटी ऑक्सीडेंट्स अधिक मात्रा में होते हैं। यह बालों और त्वचा को स्वस्थ रखता है। इसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है।अस्थमा, अर्थराइटिस, त्वचा की समस्याओं, एक्जीमा और सोरियासिस जैसी बीमारियों से सुरक्षा देता है। सर्दियों में रोजाना दो अखरोट खाने के अनेक लाभ हैं, आज हम आपको बताने जा रहे हैं अखरोट के सर्दियों में नियमित सेवन से होने वाले कुछ खास फायदों के बारे में....
1. 21 से 35 आयु वर्ग के 117 स्वस्थ व्यक्तियों में कराए गए अध्ययन में लोगों को दो समूह में बांटा गया। 58 पुरुषों को किसी प्रकार के बादाम या अखरोट रहित आहार का सेवन कराया गया जबकि 59 पुरुषों को नियमित 75 ग्राम अखरोट खिलाया गया। इस शोध में यह पाया गया कि दोनों समूह के शरीर के बाडी मास इंडेक्स,वजन एवं सक्रियता के स्तर में कुछ खास फर्क नहीं पड़ा,लेकिन जिस समूह को 75 ग्राम की मात्रा में नियमित अखरोट दिया गया था, उनके सीमेन स्थित शुक्राणुओं में गजब का सकारात्मक प्रभाव देखा गया और इससे यह निष्कर्ष मिला कि 75 ग्राम नियमित अखरोट का सेवन शक्राणुओं को ऊर्जा,शक्ति एवं सक्रिय बनाता है।
2. अखरोट के आकार को ध्यान से देखने पर उसका शेप इंसान के दिमाग जैसा लगता है।प्राचीन चीन अवधारणा इसे महज संयोग नहीं मानती। अखरोट में कई सारे चिकित्सकीय गुण हैं, खासतौर पर बात जब दिमाग की आती है तो अखरोट का सेवन यादादाश्त को दुरुस्त करने और मानसिक थकान को कम करने में उपयोगी माना जाता है
3.अखरोट शरीर के कैंसररोधी गुणों में बढ़ोत्त्री करते हैं। इसमें एंटी ऑक्सीडेंट होता है, जो कैंसर सेल को इकठ्ठा होने से रोकता है। अखरोट ब्रेस्ट कैंसर को रोकने में विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है।
4. अखरोट खून में कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करता है और पेट संबधी समस्याओं को दूर करता है। यह इस तरह बेहतर पाचन में मदद करता है और अधिक कैलोरी जलाता है। इसलिए आप एक दिन में 2-3 अखरोट खा कर अपना वजन कम कर सकते हैं।
5. अखरोट में सबसे ज्यादा विटामिन ई और प्रोटीन पाया जाता है। इसके नियमित सेवन से बाल व स्किन दोनों हेल्दी रहते हैं। इसमें मीट के मुकाबले ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है, अगर आप वेजिटेरियन हैं तो इसे रोजाना खाने की आदत डाल लें।

6. सर्दियों में अखरोट के नियमित सेवन से गहरी नींद आती है। दरअसल, अखरोट खाने से शरीर से मिलाटोनिन नामक हार्मोन का स्त्राव होता है। जिससे बॉडी को आराम व गर्मी मिलती है।
7. रोजाना अखरोट का सेवन डायबिटीज रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। यह रक्त वाहिकाओं को फैला देता है और मैटाबॉलिक सिंड्रोम को कम कर देता है।जिससे डायबिटीज कंट्रोल में रहती है।
8. रोजाना अखरोट खाने से हड्डियां मजबूत होती हैं। साथ ही, यह दांतों के लिए भी अच्छा होता है। दांतों के लिए अखरोट के स्वास्थ्यवर्धक गुणों के कारण डेंटिस्ट भी इसके रोजाना सेवन की सलाह देते हैं

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

कोई व्यक्ति भाग्यशाली है या नहीं, ऐसे हो जाता है मालूम

कोई व्यक्ति भाग्यशाली है या नहीं, ऐसे हो जाता है मालूम

हथेली की रेखाओं और बनावट का अध्ययन किया जाए तो किसी भी व्यक्ति की उम्र और कई गुप्त बातें भी मालूम की जा सकती हैं। हथेली की शुरुआत में कुछ रेखाएं आड़ी होती हैं, इन रेखाओं को मणिबंध कहा जाता है। मणिबंध से व्यक्ति की उम्र और भाग्य से जुड़ी कई बातें मालूम हो सकती हैं।
यदि किसी व्यक्ति की हथेली में मणिबंध वाला हिस्सा भरा हुआ हो, यहां कलाई की हड्डी दिखाई नहीं देती हो तो यह शुभ लक्षण होता है। हथेली कलाई के साथ मजबूती के साथ जुड़ी हुई दिखाई देती है और मणिबंध भी सुंदर दिखाई देता है तो यह व्यक्ति को भाग्यशाली बनाता है।

मणिबंध में एक रेखा हो तो
यदि किसी व्यक्ति की हथेली के मणिबंध में सिर्फ एक ही रेखा हो और वह दूसरी रेखाओं से कटी हुई या टूटी हुई ना हो और कलाई के चारों ओर मणिबंध की रेखा हो और उसमें जौ आकार के यव की लड़ियां हों तो व्यक्ति को जीवन में कई उपलब्धियां हासिल होती हैं। इन्हें धन संबंधी सुख भी प्राप्त होते हैं।

उम्र- मणिबंध में एक रेखा शुभ लक्षण वाली हो तो व्यक्ति की उम्र करीब 30 वर्ष तक की हो सकती है। जबकि अशुभ लक्षण वाली मणिबंध रेखा हो तो व्यक्ति की उम्र इससे भी कम हो सकती है।

यदि किसी व्यक्ति की हथेली में मणिबंध का हिस्सा ढीला और लटकता हुआ दिखाई देता है तो यह अशुभ लक्षण होता है। मणिबंध का हिस्सा सुंदर ना हो, हथेली और कलाई का जोड़ मजबूत दिखाई न देता हो तो यह दुर्भाग्य का सूचक है।

यदि मणिबंध में हड्डियां दिखाई नहीं देती हैं, कलाई और हथेली का जोड़ मजबूत है तो यह सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। इसके विपरीत मणिबंध होने पर व्यक्ति को जीवन में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है और दुर्घटना के भी योग बनते हैं।
सभी लोगों के हाथों की मणिबंध में रेखाओं की संख्या अलग-अलग होती है। किसी व्यक्ति के हाथ में मणिबंध की एक रेखा होती है, किसी के हाथ में दो या किसी व्यक्ति के हाथ में तीन रेखाएं भी होती हैं।

यदि किसी व्यक्ति की हथेली के मणिबंध में तीन रेखाएं हों और वे रेखाएं कहीं से टूटी हुई ना हो और कलाई के चारों ओर हों, रेखाओं में जौ के आकार की लड़ियां बनी दिखाई देती हों तो ऐसी रेखाएं व्यक्ति को भाग्यशाली बनाती हैं। ऐसा मणिबंध होने पर व्यक्ति सभी सुख प्राप्त करता है।
यदि मणिबंध में तीन रेखाएं हों और वे टूटी हुई दिखाई देती हैं तो यह अशुभ लक्षण होता है। ऐसी रेखाएं जिन लोगों के हाथ में होती हैं, वे कठिन परिश्रम के बाद ही कुछ सफलता या सकारात्मक फल प्राप्त कर पाते हैं। इनके जीवन में संघर्ष अधिक होता है।
उम्र- मणिबंध में तीन रेखाएं शुभ लक्षण वाली होती हैं तो व्यक्ति की उम्र करीब 70 से 85 वर्ष तक की हो सकती है। जबकि अशुभ लक्षण होने पर उम्र में कमी आने की संभावनाएं रहती हैं।

मणिबंध में दो रेखाएं हों तो
यदि किसी व्यक्ति की हथेली में मणिबंध की दो रेखाएं हों, वे टूटी हुई न हों, जौ के आकार के यव वाली लड़ियां हों, कलाई के चारों और हों तो यह भी शुभ लक्षण होता है। ऐसे लोगों के जीवन में सुख-सुविधाएं रहती हैं।
यदि किसी व्यक्ति की हथेली में मणिबंध की दो रेखाएं हैं और यहां बताए गए शुभ लक्षण नहीं हैं तो वे रेखाएं यही बताती हैं कि व्यक्ति को जीवन में कठिन परिश्रम के बाद ही सफलता मिलेगी।
उम्र- मणिबंध में दो रेखाएं शुभ लक्षण वाली हों तो व्यक्ति की उम्र करीब 45 से 55 वर्ष तक की हो सकती है। जबकि अशुभ लक्षण होने पर उम्र में कमी आने की संभावनाएं रहती हैं।

ये बातें भी हैं जरूरी
मणिबंध में शुभ रेखाओं के साथ ही सुंदर यवमाला होगी तो व्यक्ति भाग्यशाली हो सकता है। साथ ही, मणिबंध की रेखाएं कलाई के चारों ओर होंगी तो बहुत शुभ रहता है। यदि कलाई के चारों ओर मणिबंध की रेखाएं नहीं हैं तो शुभ प्रभावों में कमी आती है। मणिबंध के साथ ही हथेली में अन्य रेखाओं का अध्ययन करना भी जरूरी है। दूसरी रेखाओं के शुभ-अशुभ प्रभाव से मणिबंध के प्रभाव बदल भी सकते हैं। यदि व्यक्ति की हथेली में जीवन रेखा अच्छी स्थिति में ना हो और मणिबंध शुभ लक्षण वाला है तो व्यक्ति को भाग्य का साथ मिलता है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

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