करीब चार साल पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना था कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाकी ने 1528 में तुड़वाकर वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था। इसी तथ्य को आधार बनाकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ये फैसला सुनाया था।
पुरातत्व विभाग भारत की रिपोर्ट इस फैसले में अहम सबूत बनी थी जिसमें कहा गया था कि आयोध्या में जिस स्थान पर मस्जिद थी उसे किसी हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। देश के वरिष्ठ पत्रकार एवं उपन्यासकार स्वर्गीय कमलेश्वर के सन् 2000 में प्रकाशित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में उन्होंने तथ्यों के हवाला देते हुए बताया गया है कि अयोध्या में न कभी बाबरी मस्जिद नाम की मस्जिद थी और न ही राम मंदिर।
अंग्रेजों ने बोया विवाद का बीज
अयोध्या में इस जगह को लेकर सन 1949 से देश में विवाद है। वहां न बाबरी मस्जिद थी और न ही राम मंदिर। क़िताब में कमलेश्वर ने बताया है कि भारत में हिंदू और मुसलमानों में विवाद का यह बीज अंग्रेज़ों ने बोया था। इसकी शुरुआत 1947 में देश के विभाजन के रूप में हुई थी। कमलेश्वर ने इस उपन्यास की शुरुआत रामजन्म भूमि आंदोलन शुरू होने के बाद से की थी। करीब बारह साल के रिसर्चके बाद ऐतिहासिक तथ्यों को तफ्तीश के बाद बाद ‘कितने पाकिस्तान’ को लिखा है। उन्होंने क़िताब में बताने की कोशिश की है कि वहां बाबरी मस्जिद या राम मंदिर नहीं था।
अटलजी की सरकार ने किया था पुरस्कृत
अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में क़िताब को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। उस समय एचआरडी मिनिस्टर हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के एक बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी थे। माना जाता है कि कोई सरकार किसी क़िताब को पुरस्कृत तब करती है जब वह सरकार क़िताब में लिखी हर बात से सहमत होती है। कमलेश्वर ने बड़ी ख़ूबसूरती से समय और किरदार की सीमाओं से परे ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना की है। मुख्य किरदार अदीब यानी लेखक ‘समय की अदालत’ लगाता है, जिसमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू, अली बंधु, लार्ड माउंटबेटन, बाबर, हुमायूं, औरंगजेब, कबीर जैसे सैकड़ों ऐतिहासिक किरदारों ने ख़ुद अपने-अपने बयान दर्ज कराए हैं।
बाबर के समय से ही थी मस्जिद
यही नहीं अदालत में कई दर्जन विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भी हर विवादास्पद घटनाओं पर अपना बयान दिया है। सभी बयानात इतिहास, अंग्रेजों द्वारा तैयार गजेटियर, पुरातात्विक दस्तावेज़ों और नामचीन हस्तियों की आत्मकथाओं में उपलब्ध जानकारियों पर आधारित हैं। किताब में कई चैप्टर अयोध्या विवाद से जुड़े हैं। इसके अनुसार अयोध्या में मस्जिद बाबर के भारत पर आक्रमण करने से पहले ही मौजूद थी। बाबर 20 अप्रैल 1526 को इब्राहिम का सिर कलम करके आगरा की गद्दी पर बैठा था और हफ़्ते भर बाद 27 अप्रैल 1526 को उसके नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया।
अंग्रेजों ने नष्ट कराया शिलालेख
क़िताब के मुताबिक, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं) में एक शिलालेख बनाया गया था, जिसका जिक्र ब्रिटिश अफ़सर ए फ्यूहरर ने कई जगह किया है। फ्यूहरर ने 1880 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा था, जिसे बाद में अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के शासन में उसी के आदेश पर 1523 में शुरू हुआ और 1524 में मस्जिद पूरी हुई।
खाली जगह पर बनाई गई थी मस्जिद
शिलालेख के मुताबिक मस्जिद ख़ाली जगह पर बनाई गई थी। इसका यह भी मतलब होता है कि अगर विवादित स्थल पर राम या किसी दूसरे देवता का मंदिर था, जिसके अवशेष खुदाई करने वालों को मिले हैं। उसे 14वीं सदी से पहले तोड़ दिया गया होगा। या फिर ख़ुद ही नष्ट हो गया होगा। उसे कम से कम बाबर या मीरबाकी ने नहीं तुड़वाया होगा।
दो अंग्रेज अफसरों की है करतूत
कमलेश्वर की ‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में अंग्रेज अफसर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। साजिशकर्ता वही थी। बाद में उसने ही फैजाबाद का गजेटियर तैयार किया था। इस साजिश में एक अफसर कनिंघम भी शामिल था। इसको अंग्रेज सरकार ने हिंदुस्तान की पुरानी इमारतों की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी थी। क़िताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद नींव रखी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमले के दौरान लड़ाई में बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हजार हिंदुओं को मार दिया।
तो क्या गजेटिर में गलत जानकारी है
फैजाबाद के गजेटियर में 1869 में, बाबर के कथित आक्रमण के करीब साढ़े तीन सौ साल बाद, अयोध्या- फैजाबाद की आबादी दस हजार थी। 1881 में ये साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों की हत्या कैसे की। अंग्रेज अफसरों ने बाबर की डायरी बाबरनामा से तीन अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच 20 से ज्यादा पेज ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी‘औध’ को ‘अयोध्या’ कर दिया। मगर मस्जिद के शिलालेख के फ्यूहरर के अनुवाद को ग़ायब करना ये दोनों अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी जियोल़ाजिकल इंडिया की फाइल में है।
अंग्रेज क्या चाहते थे
‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने दावा किया है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ चौकन्ने हो गए थे और ब्रिटिश इंडिया की नई पॉलिसी बनी, जिसके मुताबिक अंग्रेजों ने तय किया कि अगर इस उपमहाद्वीप पर लंबे समय तक शासन करना है, तो इसे धर्म के आधार पर विभाजित करना होगा। ताकि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से ही लड़ते रहें और उनका ध्यान आज़ादी जैसे मुद्दों पर न जाए। इसी नीति के तहत लोदी की मस्जिद ‘बाबरी मस्जिद’ बना दी गई और उसे ‘राम मंदिर’ से जोड़कर ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो कभी हल ही नहीं हो।
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